ਵਿਚਾਰ
मन की बात!
प्रधानमंत्री जी, किसे उल्लू बनाते हो आप!
- प्रेम कुमार मणि
प्रधानमंत्री जी, किसे उल्लू बनाते हो आप!



प्रधानमंत्री जी, 

सम्पूर्ण देश के साथ मैं भी घर में दुबका हुआ कोरोना -व्याधि के खिलाफ जंग लड़ रहा हूँ. यह मेरा अनुशासन भी है और अपने प्रधानमंत्री के आवश्यक अनुदेशों का पालन भी, जिसे एक नागरिक के तौर पर हर किसी को करना चाहिए. मैं पूरी तरह इस नतीजे पर हूँ कि इससे बेहतर कोई उपाय नहीं है, इस व्याधि से जूझने का. उम्मीद करता हूँ कि रोग पर काबू पाने में हम जल्दी ही सफल होंगे. यह भी उम्मीद है कि हमारे मुल्क और दुनिया के काबिल वैज्ञानिक जल्दी ही इसके उन्मूलन केलिए कोई कारगर दवा ढूँढ निकालेंगे. 

लेकिन यहीं पर आपसे कुछ बातें कहनी थी. कल यानि 24 मार्च को  जब आप मुल्क को सम्बोधित कर रहे थे, तब आपने कहा कि 67 दिनों में इस व्याधि से एक लाख लोग ग्रसित हुए, अगले ग्यारह रोज में और एक लाख लोग हो गए, उससे अगले केवल चार रोज में ही और एक लाख लोग हो गए. इन पंक्तियों के लिखे जाने तक WHO के मुताबिक आक्रांत लोगों की संख्या चार लाख से ऊपर हो गयी है. मतलब पिछले चौबीस घंटों में ही और एक लाख लोग मरीज हो गए.
 
बढ़ोत्तरी की दर बहुत खतरनाक है. यहीं आपसे पूछना चाहूंगा कि आपको तो सब पता था. WHO ने आपको ससमय सूचनाएँ दी होंगी. आपकी अपनी एजेंसियां काम कर रही हैं. इस जीवाणु- युद्ध से मुकाबिले में आप इतने पिछड़ कैसे गए?
 
अनेक देश जिसमे चीन सबसे आगे है, ने चुस्ती दिखला कर इस व्याधि पर काबू पा लिया है.
 
आपकी लापरवाही की सजा पूरा देश भुगत रहा है. जब आपको सूचनाएँ मिली तब आप कर क्या रहे थे?
 
आप तो मार्च के दूसरे हप्ते में जागे. तब तक पानी बहुत ऊपर आ चुका था.

देखें वीडियो:

आपने 22 मार्च को जनता कर्फ्यू की अपील की और उसे प्रहसन बनाने केलिए ताली और थाली पिटवाने की व्यवस्था भी कर दी. . आपके भक्तों ने तबियत से यह किया भी. आपने कहा कि यह डाक्टरों का हौसला बढ़ाने केलिए किया जा रहा था . 

प्रधानमंत्री जी, किसे उल्लू बनाते हो आप ! आप खुद अपना मजाक उड़ा रहे हो.
 
आपको जो समय मिला था, उसमे आपको अपने अस्पतालों को चुस्त -दुरुस्त करना था. चीन में दस रोज में हज़ार बिस्तरों के अस्पताल बन जाते हैं. हमारे यहां भी महीना भर में कई अस्पताल  बन जाते. आपने ध्यान नहीं दिया. जिस वक़्त आप नागरिकता संशोधन कानून और राम मंदिर में देश भर को उलझाए हुए थे, वही वक़्त इस बीमारी के फैलने का था.
 
अलगाव  कैंप तो दर असल उन लोगों केलिए बनना चाहिए था, जो विदेशों से  इस बीच लौट रहे थे. आपको सीमायें सील करनी थी और तमाम हवाईअड्डों पर सघन जांच कैंप बनवाने थे. कुछ हज़ार या लाख लोग विदेशों से लौटे होंगे. उन सबको यदि एक महीने सुरक्षित शिविरों में रख कर ही बाहर आने की अनुमति होती तो खतरा होता ही नहीं. क्योंकि यह बीमारी बाहर से आये हुए लोगों द्वारा ही फैली है.
 
अब तक कोई मरीज ऐसा नहीं मिला है, जो भारत से बाहर नहीं गया हो और जिसे यह बीमारी हुई हो. हाँ, अब संभव है क्योंकि जीवाण-संक्रमण हो चुका है. 

लेकिन आप इस बीच राजनीति करते रहे. आज भी  आप वही कर रहे हैं. हवाई जहाज तब तक बंद नहीं किये गए जब तक आपका मध्यप्रदेश ऑपरेशन हो नहीं गया. इसलिए कि आपको विधायकों की हवाई ढुलाई करवानी थी.
 
डाक्टरों के लिए तालियां और घंटे बजा कर आप के लोग वैज्ञानिकों और चिकित्सकों की हौसला-आफजाई नहीं करा रहे थे, वे मनोरंजन और एक भावी करवाई का जश्न मना रहे थे .
 
अगले रोज आपका फ़ौज-फाटा एक तरफ दिल्ली के शाहीनबाग को उजाड़ कर उनके इश्तेहार मिटा रहा था तो दूसरी तरफ आपके उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रामलला की मूर्तियां  'वाजिब' जगह पर रखवा  रहे थे. मध्यप्रदेश में राजतिलक का जश्न मनाने में कर्फ्यू बाधक नहीं बना, लेकिन लाखों दिहाड़ी मजदूर और आमजन पुलिसिया ज़ुल्म के शिकार हुए.
 
प्रधानमंत्री जी हमने तो अपने को काबू में किया, लेकिन आप तो दूध का शाइन-बोर्ड लगाकर ताड़ी बेचते रहे.
 
कौन है देशभक्त और कौन है देशद्रोही? आप ही बताइये.
 
यह इक्कीस दिनों (यदि और लम्बा नहीं  खिंचा तो) का संकट बस आपके कारण है. ऐसा लगता है आप को खून का चस्का लग चुका है.
 
कश्मीर को महीनों कैदखाने में बदलकर आपको लगा होगा, पूरे देश को एक दफा इस दशा में ले आओ. यह एक मनोदशा होती है. परपीड़न का सुख इसे ही कहते हैं.
 
पूरे मुल्क को घरों में बंद कर आप रामलला की मूर्ती सजाने, शाहीनबाग के इश्तेहार मिटाने और मध्यप्रदेश में सरकार पलटने में लगे रहे. देश को लेकर यदि यही आपकी संजीदगी है तब किसी को कुछ कहने का कोई मतलब भी है क्या?

प्रधानमंत्री जी, आज के ज़माने में कोई देश-समाज वैज्ञानिक नजरिये और तकनीक के विस्तार से ही मजबूत होगा. रामजी और रहीमजी देश को मजबूत नहीं करेंगे. आपको लगता है ताली पीटने वाले लोग आपके मित्र  हैं और मेरे जैसे लोग शत्रु. आप ही कहते हो चाय बेचने वाले परिवार से आता हूँ. यदि यह सच है, तो उनलोगों की पीड़ा समझो, जो मिहनतक़श हैं, दिहाड़ी मजदूर हैं, किसान हैं. वे सब अपने मुल्क से अपनी माटी से प्यार करते हैं. आपके लिए ताली बजाने वाले लोग अपना स्वार्थ साधते हैं. आपको उल्लू बनाते हैं.
 
इन साधु-जोगियों के कब्जे से बाहर आओ प्रधानमंत्री जी. देश और दुनिया खतरे में है. मानव जाति का अस्तित्व ही खतरे में है. मतभेदों को भूल कर, तंग नजरिये को त्याग कर हमे आगे बढ़ना होगा. पूरी दुनिया की आर्थिक स्थिति चरमरा चुकी है. अपने देश की तो और भी. हमें समग्रता में सोच कर काम करना होगा. 

भवदीय,
प्रेम कुमार मणि

लेखक हिंदी के प्रख्यात साहित्यकार और बिहार विधान परिषद् के पूर्व सदस्य हैं।
 
 
 
 
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 देखें वीडियो:
 

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